Friday, January 2, 2009


लग रहा हैं ज़िंदगी बीती जा रही है
कुछ किया ही ना हो जैसे
बस दुनियादारी की दौड़ भाग में
सारा वक़्त निकल गया हो जैसे

एक अलग दुनिया की सैर से
लौटने पर जब महसूस ये किया
तो लगा कहाँ चल गया वो जुनूं
उस दुनिया का हिस्सा होने का

धूल जम गई है शायद
हाँ, धूल जम गई है
परत दर परत धूल
और अब हिम्मत भी नही होती
धूल हटा, उस दुनिया में पहचान बनाने की

पर जोश और जुनूं मरा नही है अभी
दबा, कुचला पड़ा है किसी एक कोने में
साँसें ले रहा है पर, जी रहा है
हारा नहीं है अभी
हारा नहीं है वो